जब नटराज ने किया तांडव, तब जुड़ीं भरतनाट्यम में 108 मुद्राएं, ऐसे बना ये लोकनृत्य तमिलनाडु की खास पहचान

दक्षिण भारत की प्राचीन शास्त्रीय नृत्य शैली की बात जब भी होती है, तो उसमें भरतनाट्यम का नाम सबसे पहले लिया जाता है। घुंघरूओं की आवाज, पैरों में थिरकन, चेहरे के हाव-भाव और आंखों के इशारे, यही खासियत है तमिलनाडु के इस लोकनृत्य की; जो बिना बोले ही अपनी कहानी कहता है।
आइए सदियों पुराने तमिलनाडु के इस लोकनृत्य की कहानी जानते हैं कि कैसे इसकी शुरुआत हुई और इसका दक्षिण भारत की परंपरा में क्या महत्व है।
भरतनाट्यम की उत्पत्ति कब हुई?
तमिल नाडु के प्राचीन लोकनृत्य भरतनाट्यम का इतिहास आज से 2000 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है। इसकी उत्पत्ति प्राचीन ग्रंथ नाट्यशस्त्र से हुई है, जिसके रचयिता भरत मुनि थे। इस नृत्य को पुराने समय में सादिर या दासी अट्टम कहा जाता था, क्योंकि यह देवदासियों द्वारा मंदिरों में किया जाने वाला नृत्य था।
भरतनाट्यम नृत्य शैली को सबसे अधिक लोकप्रियता 18वीं सदी में मिलनी शुरू हुई थी, जिसमें बाद में पेशेवरों ने अपने-अपने तरीकों से इसे नया रूप दिया। इसी के चलते नृत्य की आज बहुत सी शैलियां देखने को मिलती हैं, जिन्हें भरतनाट्यम बानी याने घराने कहा जाता है। बता दें कि इन्हें आज तंजावुर बानी, पंडानल्लूर बानी, वज़ुवूर बानी, कलाक्षेत्र बानी और मेलत्तूर बानी कुल पांच सबसे प्रमुख शैलियों में बांटा गया है।
नाम में छिपा है गहरा अर्थ
साल 1932 में इस खास नृत्य शैली को भरतनाट्यम नाम की आधिकारिक मान्यता दी गई। वहीं, यह नाम अपने आप में बहुत सी बातें कहता है क्योंकि इसे चार तत्वों के मेल से मिलकर बना है- भाव, राग, ताल और नाट्य। पारंपरिक तौर पर यह नृत्य कम उम्र की युवतियां मंदिरों और बाद में दरबारों में एकल रूप में किया करती थीं।
भगवान शिव के नटराज रूप से जुड़ी है इसकी पौराणिक कहानी
ऐसी मान्यता है कि भरत मुनि ने भगवान शिव के समक्ष समुद्रमंथन से जुड़ा नृत्य प्रस्तुत किया था। इसके बाद भगवान शिव ने प्रसन्न होकर अपने नटराज स्वरूप में 108 शारीरिक, हस्त और पैरों की मुद्राओं वाला तांडव किया था। बता दें कि नृत्य शैली में इन्हीं मुद्राओं को करण कहा गया। जब उनके नृत्य में धीमी गति और कोमल मुद्राओं की कमी महसूस हुई, तब भगवान ने लास्य नृत्य के माध्यम से इसे सम्पूर्ण किया।
कैसे किया जाता है भरतनाट्यम?
इस नृत्य में शारीरिक मुद्राओं का खास महत्व होता है, इसे अंगशुद्धि माना जाता है। हर एक मुद्रा और कदम शरीर के संतुलन को दिखाते हैं। इसमें समभंग की भी पद्धति है, जो इस बात पर ध्यान देती है कि शरीर का वजन कुछ इस तरह फैले कि शारीरिक स्थिरता बनी रहे।
मुख्य मुद्राएं
-
समापदम : इसमें शरीर का वजन दोनों पैरों पर समान रूप से विभाजित होता है।
-
अराइमंडी : यह घुटनों को बाहर की तरफ आधा मोड़कर बैठने की मुद्रा है।
-
मुझु मंडी : इस मुद्रा में नर्तक पूरी तरह से बैठा होता है, और वजन एड़ियों से पंजों पर चला जाता है।
अन्य पोज
-
प्रेन्खण : इस पोज में एक पैर जमीन पर सपाट तो दूसरा पैर आगे या बगल में एड़ी पर होता है।
-
स्वस्तिक : इसमें नर्तक के दोनों पैर क्रिस-क्रॉस पोजिशन में होते हैं।
-
एक पाद : एक पैर पर शरीर टिकाकर दूसरे पैर को पहले पैर के घुटनों पर टिकाने के पोज को एक पाद कहा जाता है।
-
नटराज पोज : यह भगवान शिव के तांडव नृत्य से प्रेरित पोज है, जिसमें एक पैर पर खड़े होकर दूसरे पैर को हवा में उठा दिया जाता है।



