राजस्थानराज्य

आरुषि हत्याकांड से ‘किलर’ आयुषी तक… रिश्तों का कत्ल और संवेदनाओं का अंत!

साल 2008… मई का महीना और एक हत्याकांड ने देश के बड़ों-बड़ों को ही नहीं बच्चों को भी हिलाकर रख दिया. वो आरुषि हत्याकांड जिसके बाद बच्चे अपने मां-बाप से पूछने लगे थे- क्या आप भी हमें मार देंगें? इतने संवेदनशील सवाल के बावजूद समाज ने इसे उस गंभीरता से नहीं लिया, जितने की दरकार थी. यानी साल 2008 तक भी समाज इतना विवेकवान संवेदन और रिश्तों को लेकर संजीदा था कि ऐसी खबरें अचरज पैदा करती थीं.

2008 से 2026 के इन 18 सालों में हमने ना जाने कैसी प्रगति कर ली कि अब जो हो जाए वो कम लगता है. लड़की ने पिता की मृत्यु के बाद मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति के लिए मां को मार डाला, अभी इस पर हैरत हो रही थी कि मालूम चला पिता को भी उसने ही मारा था. गंगानगर में एक 13 साल की बच्ची से दर्जनों लोगों ने कई रोज बलात्कार किया. खबर इतनी वीभत्स थी कि सभ्य समाज ने पूरी की पूरी खबर से ही नजरें चुरा लीं.

बच्चियां मर रहीं हैं क्योंकि परिवार सेंसिटिव नहीं
बच्चियां मर रही हैं क्योंकि पुरुष सेंसिटिव नहीं हैं. बच्चियां मर रही हैं और स्कूल सेंसिटिव नहीं हैं. बच्चियां मर रहीं हैं क्योंकि परिवार सेंसिटिव नहीं हैं. बच्चियां मर रहीं हैं क्योंकि समाज सेंसिटिव नहीं हैं. लड़कियां मर रही हैं क्योंकि पिता सेंसिटिव नहीं हैं. लड़कियां मर रही हैं क्योंकि ससुराल सेंसटिव नहीं हैं. लड़कियां मर रही हैं क्योंकि मायका सेंसटिव नहीं है.

मां-बाप मर रहे हैं क्योंकि बच्चे सेंसिटिव नहीं
मां-बाप मर रहे हैं क्योंकि बच्चे सेंसिटिव नहीं हैं. मंगेतर मर रहे हैं क्योंकि लड़कियां सेंसिटिव नहीं हैं. पति मर रहें हैं क्योंकि पत्नियां सेंसिटिव नहीं हैं. दर्द से गुजरा व्यक्ति कभी-कभी कह उठता है कि अब कोई गम बड़ा नहीं लगता. वैसे ही समाज में जो हो रहा है उसके बाद हाय-तौबा वाली स्थिति अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है. कलंक लगता जाए लेकिन कंटेंट में कोई कमी आए तो कहिए. प्रेम में पड़ी स्त्री के इस रूप की कोई कवि भी व्याख्या नहीं कर सकता जो भतीजे के साथ भागी जा रही है.

चरित्र और व्यवहार कानून का विषय नहीं
दामाद के साथ भागी जा रही है. पति को ड्रम में चुनवाए दे रही है. मंगेतर को खाई में गिराए दे रही है. इन सबसे ध्यान हटाने को आपका मूड बनाने को जो कंटेट है वो इन अपराधों में मीम में समेंटे दे रहा है. मीम पर हंसकर आपको लगता है कि ये तो हल्की सी ही बात है. बस कंटेट बढ़ता जा रहा है. समाज हल्का और हल्का होता जा रहा है. कारण पर चर्चा नहीं, व्यक्ति परिवार समाज से लेकर सरकार तक कारण सबको समझ ही आ जाते हैं. हालांकि, चरित्र और व्यवहार कानून का विषय नहीं है. बात ये है कि जो कानून का विषय नहीं है, जरूरी नहीं, वो कंटेट में झोंक दिया जाए!

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