बिहारराज्य

गंगा ही बाधा, गंगा ही राह; भागलपुर में आखिरी जहाज छूटा तो बियाडा घाट पर अजनबियों में हुआ अपनापन… जुड़े दिलों के तार

Bhagalpur BIADA Ghat Ground Report: विक्रमशिला सेतु पर वाहनों के पहिए क्या थमे, उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच की दूरियां मां गंगा के रहमोकरम पर आ टिकी हैं। यहां मुसाफिरों की जिंदगी का फलसफा ऐसा बदला है कि गंगा ही बाधा बन गई है और गंगा ही राह। जो सफर पहले महज 15 मिनट में तय हो जाता था, वह अब घंटों की जद्दोजहद में बदल चुका है।

जिनका आखिरी जहाज छूट जाता है, उनकी दूरी कम से कम 13 घंटे बढ़ जाती है। लेकिन इस विवशता के बीच बरारी बियाडा घाट पर इंसानियत और सामाजिक ताने-बाने की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर भी उभर रही है, जहां शाम तक अजनबी रहे लोग सुबह तक एक-दूसरे के हमसफर बन रहे हैं।

Bhagalpur Ferry Woes Strangers Find Kinship at Biada Ghat (1)

शाम पांच बजे छूटा जहाज

रविवार शाम के ठीक पांच बजे थे। बरारी बियाडा घाट से जहाज का आखिरी सायरन गूंजकर शांत हुआ, लोहे का भारी रैंप ऊपर उठा और जहाज गंगा की लहरों को चीरता हुआ मुड़ गया। कुछ मुसाफिर दौड़ते-हांफते घाट पहुंचे, लेकिन जहाज आंखों से ओझल हो चुका था। कुछ ही मिनटों में बियाडा घाट पर बने सरकारी पंडाल में करीब तीन दर्जन यात्री रात काटने के मूड में बैठ गए।

चेहरे पर खीझ और लाचारी

स्टेशन से एक ही टोटो पर बैठकर आए दुमका के रूपेश शर्मा, देवघर के सुमन और रजौन के सावन सिंह आपस में बतिया रहे थे। सुमन ने भारी मन से कहा, “अगर यह वजनी सामान साथ नहीं होता, तो शायद दौड़कर जहाज पकड़ लेते। अब कोई चारा नहीं… रात यहीं काटनी होगी।” पंडाल में मौजूद सभी लोगों की उम्र, कद-काठी, बोलचाल और मंजिलें जुदा थीं, लेकिन सबके चेहरे पर एक जैसी खीझ थी कि काश कुछ मिनट पहले आ जाते, तो गंगा रास्ते की बाधा न बनती।

Bhagalpur Ferry Woes Strangers Find Kinship at Biada Ghat (2)

रात के डेढ़ बजे, मच्छरों के बीच सामान की पहरेदारी

रात के डेढ़ बजे प्रशासनिक शेड यात्रियों से खचाखच भरा था। अधिकांश लोग गहरी थकान में नींद के आगोश में थे, कोई कुर्सियों पर ही लुढ़क गया था तो कोई मोबाइल स्क्रीन पर वक्त काट रहा था। मच्छरों के डंक के बीच रूपेश जाग रहे थे। पूछने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “इस माहौल में सोने की आदत नहीं है, इसलिए नींद नहीं आ रही। बाकी टोटो वाले साथियों ने कहा कि आप जाग रहे हैं तो सामान देखते रहिए।” एक अजनबी ने दूसरे अजनबी की अमानत पर पूरा भरोसा जता दिया था।

सुबह 5:30 बजे, सायरन की आवाज और खिल उठे चेहरे

सोमवार सुबह साढ़े पांच बजे जब जहाज का पहला सायरन गूंजा, तो पंडाल की अलसाई फिजा में अचानक ऊर्जा दौड़ गई। रात भर फर्श और कुर्सियों पर अंगड़ाई तोड़ रहे मुसाफिर अपनी गठरी और बच्चों को समेटकर जहाज की ओर लपके। रात भर के भारी इंतजार के बाद गंगा ने आखिरकार उन्हें पार जाने की राह दे दी थी।

Bhagalpur Ferry Woes Strangers Find Kinship at Biada Ghat (3)

मजबूरी के घाट पर पनपा अपनापन

इस भागदौड़ और संकट ने समाज को जोड़ने का अनूठा काम किया। शाम को टोटो में साथ बैठे जिन छह अजनबी यात्रियों के सामने रात के भोजन का संकट था, उन्होंने मिलकर रास्ता निकाला। एक ने सामान की रखवाली की तो दूसरे बाजार से सबके लिए खाना लेकर आए। सुबह होते-होते सबने एक-दूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए। सुमन को कटिहार जाना था, रूपेश को बारसोई और सावन को कुर्सेला।

नंबर बदले और बने रिश्ते

तभी उनके साथ रात बिताने वाले नवगछिया के विपिन सिंह ने अपनापन दिखाते हुए कहा- “आप सभी को गाड़ी नवगछिया से ही मिलेगी। पहले सब मेरे घर चलिए, चाय-नाश्ता कीजिए, फिर आगे की बस पकड़िएगा।” शाम तक जो लोग एक-दूसरे के नाम तक से अनजान थे, सुबह गंगा पार करते वक्त वे एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बन चुके थे।

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